Monday, May 20, 2013

कि इससे ज्यादा इश्क का इम्तेहान क्या लोगे उसी से छुपाने का ये फन है जिसे बताना है राज दिल का

 कि इससे ज्यादा इश्क का इम्तेहान क्या लोगे 
 उसी से छुपाने का ये फन है जिसे बताना है राज दिल का 

मौला क्यूँ मुक़द्दर के नाम पे तेरी दुनिया बाँट दी जाती है

१/मौला क्यूँ मुक़द्दर के नाम पे तेरी दुनिया बाँट दी जाती है
जब कोई जलता है तो किसी के हिस्से में रौशनी आती है

२/न हर महफ़िल में इश्क होता है, न हर चिराग ही धुआं देता है
हम फिर भी जिद में बैठे हैं कि वो बेवफा नहीं

कोई रोके हमें खुदा का वास्ता देकर
कि हर मस्जिद में मिलता है बस इन्सान यक़ीनन खुदा नहीं 

Saturday, May 18, 2013

मोहब्बत की उचाईयों को छूने वाले, दिल की गहराइयों में डूब जाते है

मोहब्बत की उचाईयों को छूने वाले, दिल की गहराइयों में डूब जाते है
और डूबते हैं भी हैं वही आशिक, जो अच्छी तरह तैरना सीख जाते है

मेले में लोगों से घिरे लोगों से पूछ कर देखो
मेले उजड़ जाने के बाद ये कैसे तनहाइयों में डूब जाते है ?







जग जा रे मन भोर भई कब कौन उठावन आयेगा .

जग जा रे मन भोर भई अब कौन उठावन आयेगा .
तारे रीते , चमका सूरज , तू सोता रह जाये ना
कलरव करते पक्षी अम्बर को छूके कबके लौट चुके
जागा जग सारा तू भी उठ ,आंखे मलता रह जाये ना
बीत गए युग ,बदले मौसम ,कौन जगावन आयेगा
हिम्मत कर और तान हौसला , करवट बदले क्या पायेगा
देश है कातर नज़रों से रे , तेरा भी रस्ता बाट रहा
देख हक़ीक़त ,खोल ले आंखें ,सपनों में तू घुल जाये ना

Sunday, May 12, 2013

हम जो पीते हैं ,कि प्यालों से सबक लेते हैं अपने मेहबूब के आने की तमन्ना लेकर ये तो हर लब को होंठो से लगा लेते हैं

हम जो पीते हैं ,कि प्यालों से सबक लेते हैं
अपने मेहबूब के आने की तमन्ना लेकर
ये तो हर लब को होंठो से लगा लेते हैं

हम जो जीते हैं ,कि दरख्तों से सबक लेते हैं
अपने मेहबूब के आने की तमन्ना लेकर
ये तो हर राही को आँचल में छुपा लेते हैं

हम जो रोते हैं,कि आइनों से सबक लेते है
अपने मेहबूब के आने की तमन्ना लेकर
ये तो हर शख्स के आंसू को सीने में छुपा लेते हैं

हम जो डरते हैं,कि समंदर से सबक लेते हैं
अपने मेहबूब के आने की तमन्ना लेकर
ये तो हर बूंद को हमराज बना लेते हैं 

तेरी मेंहदी की रंगत देख के हैरान मत होना मेरे भी खून का इसमें है कुछ तो रंग आना है

मोहब्बत की कहानी में ,मैं सागर तू किनारा है
तेरे लब चूम तो लूंगा ,मगर फिर लौट जाना है 

मेरी बेहोश पलकों में कई हैं ख्वाब  संजीदा 
मैं फिर क्यूँ होश में आऊं ,इन्हें जब टूट जाना है

मुझे खामोश रहने दो , मेरे लब रूठ जायेंगे

मेरी ख़ामोशी में संग हैं ,यही इनका फ़साना है
मेरे मुंह खोलने का मतलब ही इनका दूर जाना है

तेरी मेंहदी की रंगत देख के हैरान मत होना
मेरे भी खून का इसमें है कुछ तो रंग आना है

कबसे कैद हैं आँसू  ,मेरी पलकों के साये में

मेरे सपनों को सींचा है ,कि हर आंसू दीवाना है
मगर एक बूंद ही तो है ,इसे फिर बह ही जाना है






ऐसे वक़्त पर दगा दे जाते हैं जब कोई आसरा नहीं बचता एक हम हैं कि भरी धूप में आपके लिए रौशनी का इन्तेजाम करते हैं

लड़ते हैं ,झगड़ते हैं, मोहब्बत में कत्ले आम करते हैं
एक हम हैं कि उनसे भी मोहब्बत करते है जो आप से मोहब्बत करते हैं

संगे दिल कहकर ,पीठ पे खंजर से वार करते हैं
एक हम हैं कि आप शक करते हैं तो समझते हैं कि आप हमें याद करते है

ऐसे वक़्त पर दगा दे जाते हैं जब कोई आसरा नहीं बचता
एक हम हैं कि भरी धूप में आपके लिए रौशनी का इन्तेजाम करते हैं

क्यूँ हमसे काफ़िर का सा सलूक किया जाता है बस इसलिए कि हमें खुदा को साकी बनाने में मजा आता है

हमें  ख़ामोशी में खुद को सुनने का मजा आता है
लोग जिसे  मरना कहते हैं उसमे हमें जीने का मजा आता है

क्यूँ हमसे काफ़िर का सा सलूक किया जाता है
बस इसलिए कि हमें खुदा को साकी बनाने में मजा आता है

कद्रदानों से घिरे लोगों से शिकायत नहीं हमको
फिर क्यूँ तकलीफ है जब हमें अपनी शायरी में मजा आता है

सीने में धडकते होंगे दिल तुम्हारे तो क्या खास है
हमें तो दिल हाथ में लेकर चलने में मजा आता है




जुल्फों को बादल ,आँचल को झरना ,मोहब्बत को काम समझ बैठे थे लोगों ने दीवाना क्या कह दिया हम उसे अपना नाम समझ बैठे थे




जुल्फों को बादल ,आँचल को झरना ,मोहब्बत को काम समझ बैठे थे
लोगों ने दीवाना  क्या कह दिया हम उसे अपना नाम समझ बैठे थे


मेरी जिंदगी के उजाले तेरे हिस्से में आये तो क्या गम है
हम ही तो थे जो तेरे अंधेरों से प्यार कर बैठे थे

मुडती रही राह इस कदर फिर भी नादान इतना समझ न पाए
कि वापस वहीं आ पहुचेंगे जहाँ से आगाज कर बैठे थे

मेरे लफ्जों का गुलदस्ता तेरे घर पहुंचे तो याद करना
हम वही हैं जो एक बेवफा से वफ़ा का इजहार कर बैठे थे



Saturday, May 11, 2013

कुत्ता - लघु कथा

गाँव की गली में एक कुत्ता घायल अवस्था में पड़ा था।किसी दुर्घटना में उसके अगले पैरों और सिर में चोट आ गयी थी। किसी तरह अपने को घसीटता हुआ वो उस जगह पर आ गया जो उसके आश्रयदाताओं की दहलीज थी और जहाँ खेल-खाकर ,वो पिल्ला कुत्ता बना था .

उसी गाँव के दूसरे छोर पर दीनू जमींदार बैठकर हुक्का सुलगा रहे थे .केवल नाम के जमींदार थे दीनू !असल जमींदार इनके पिता रतन सिंह थे।उनके ज़माने में अच्छी खासी जायजाद थी . जहाँ बिगड़ा आज हुआ ट्रेक्टर खड़ा है वहां दो हाथी बंधे रहते थे। जमींदारी में तब आमद अच्छी थी और राजसी ठाट था। हवेली थी और दसियों नौकर चाकर।रतन सिंह रेशमी साफा बांधा करते थे, दीनू हुक्का पीते -पीते उसर सिर खुजा रहे थे जिसमे उनके बंजर होते खेतों की तरह कोई उम्मीद बाकी न थी।

अब पहले जैसी बात न थी।जायजाद के नाम पर टूटी फूटी हवेली और पांच बीघा ऊसर जमीन।स्वराज आया तो तमाम खेती और जायजाद लील गया . बची कसर  दीनू के निकम्मे कपूतों ने पूरी कर दी।

''बाबूजी मधु हाथ जला बैठी है।'' भीतर से आई छोटी बहू की आवाज पर प्रतिक्रिया देने दीनू अपने दोनों
घुटनों को पकड़कर कराहते हुए उठे ,हुक्का रखा और झुकी कमर को साधकर अन्दर की ओर बढ़ चले।बडबडाते जाते , कभी मधू ,बहुओं की लापरवाही को कोसते। हाथ काफी जल गया था . डॉक्टर बुलाया गया।दीनू  धीरे से अपनी धोती की गांठ खोलकर डॉक्टर की फीस दे रहे थे।

मधु , दीनू की सबसे छोटी और प्यारी नातिन थी। दीनू दुखी थे .बड़ी मुश्किल से बचाये  पाँच रुपये भी डॉक्टर और दवाई में खर्च हो गए।

दूसरे छोर पर कुत्ता पैर फैंक रहा था ,तड़प रहा था।

चारों बेटों में लाठियां न बजें इस गरज से दीनू  ने जमीन जायजाद के हिस्से पहले ही कर दिए।बस हवेली अपने नाम रखी ।सबसे बड़ा बेटे ने अपना सब कुछ शराब के बदले तौल दिया और फिर घर से जेवर चुरा ऐसा भगा कि फिर ना लौटा।बाकि तीनों की शादी तो कर दी पर जिम्मेदारी के बाद भी तीनों सट्टेबाजी और जुए के मुरीद बने रहे .घर का सब जाता रहा।

"तुमने मुझे मारा  है ,नहीं पहले तुमने गाली दी।" बच्चों की लड़ाई से दीनू मनःस्थिति से जागे ! बच्चों को चारपाई पर बिठाकर समझाया की लड़ना बुरी बात है . उन्हें वापस खुश होकर खेलते देख दीनू  को थोडा संतोष हुआ।

उधर कुत्ते को पत्थर मारकर बच्चे खुश हो रहे थे , उसके घाव पर पड़ते पत्थरों से जब वो कराहता तो बच्चे खुश होते ,ताली बजाते।अब कुत्ते से उन्हें कोई खतरा जो नहीं था।

इधर दीनू विचामग्न थे और उस दिन को कोस रहे थे जब उन्होंने खाट पकड़ी और घर की सत्ता बेटों ने काबिज कर ली .पिछले हफ्ते की ही बात याद करते थे जब पूरे घर को दो रातों तक भूखा सोना पड़ा था .दीनू कर्ज लेकर आये तब कहीं खाना बना।

कुत्ते को बिलबिलाते दो दिन गुजर गए तो लोगों ने उसे गली से उठाकर तालाब के किनारे ले जाने का फैसला लिया .एक तो उसकी दर्द भरी आवाजों से लोगों की नीद नहीं लगती थी और दूसरा उसके घावों में कीड़े पड़ने लगे थे।कुत्ता तालाब के किनारे लाया गया। आँखों से आंसू ,मुंह से लार टपकाते हुए वो अपने आश्रयदाताओं को जाते देख रहा था। कुंकू की आवाज करके रोकने की बेकार कोशिश भी वो कर रहा था।कभी जिनकी देहरी की वो रखवाली करता था वो बस इतने दयालु निकले कि उसके नीचे एक पुराना टाट का टुकड़ा दाल दिया था, ताकि वो आराम से मर सके।

इधर दीनू अपने बीते हुए स्वर्णिम युग को याद कर रहे थे .पहले लोगों को कर्ज देते थे आज लेना पड़ रहा था।दुःख से , कर्ज से आहत दीनू के हृदय की टीस सहन से परे हो गयी , मुंह खुला रह गया ..कुछ मक्खियाँ हुक्के की बदबू वाले मुंह में घुसकर लार चाटने लगीं ......

और उधर धूल भरे ,कीड़े वाले घावों से विहल कुत्ता भी मर गया ...........

दीपक




इंसान - लघु कथा

जिंदगी उसके हाथों से फिसली जाती थी ,मगर वो देख रहा था अपने चारों ओर बिखरी हजारों अधजली लाशों को. लोगों के जिस्म से खाल लगभग उतर चुकी थी। कौन हिन्दू है कौन मुस्लमान ,जान पाना मुनासिब न था।जमीं पर फैला खून तो बस लाल ही था।

आज समझ में आता था कि  बनाने वाले ने सिर्फ इंसानों को बनाया है हिन्दू या मुसलमानों को नहीं। उसकी  एक आँख जाती रही थी और घुटने भी फट चुके थे।शरीर को और टटोला तो मालूम हुआ की रीढ़ की हड्डी भी विक्षत हो चुकी है।

धमाके  के बाद चारों और लाशें थीं और जो जिन्दा थे वो कराहकर अपने-अपने रहनुमाओं से मौत मांग रहे थे। धर्म इंसान की एकता के लिए बने थे मगर कालांतर में ये ही भाईचारे और मानवता के रास्ते की दीवार बन गए। कितना अच्छा होता ही साड़ी दुनिया का एक ही धर्म  मानव धर्म , एक ही जाती मानव जाति और एक ही कुल मानव कुल होता !

सियासत वालों ने मसले को आग दी और गैर मुल्क वालों ने हमारा ही इस्तेमाल कर हमारे आशियाने को
जला  कर खाक कर दिया।

जब बच्चा पैदा होता है तो वो न हिन्दू होता है न मुस्लमान वो सिर्फ और सिर्फ एक इंसान होता है।हिंसा कुरान या गीता के किस्सी पन्ने की किसी पंक्ति मैं नहीं लिखी ये निश्चित है!इस पर घर्म के नाम पर यह दंगे मात्र दिखाने के लिए की केवल हमारा धर्म सच्चा है . उफ़ ! कितना शर्मनाक है यह सब . आज हम सबने खुद को हिन्दू या मुस्लमान के तौर पर न देखकर बस एक इंसान  के रूप में देखा होता तो ये फिरदौस न उजड़ा होता ..........

और अब उसकी दोनों आँखें बंद हो चुकीं थीं .....


दीपक 

देखते देखते तुम ढक्कन से जाम हो गए गुठली थे जब मिले थे आज आम हो गए

देखते देखते तुम ढक्कन से जाम हो गए
गुठली थे जब मिले थे आज आम हो गए

सुना है बहुत पैसा कमा लिया तुमने
जो बनते भी न थे वो सारे काम हो गए

अब तो काफिलों की दौड़ है तुम्हारे पीछे
साईकिल पे थे कभी , आज बंद लाम हो गए


जरा देखना कि लोग मानते हैं तुमको बहुत ज्यादा
तुम ही ख़ुदा हो उनके  तुम ही उनके राम हो गए

लोगों का भरोसा न तोड़ देना ,याद रखना
तुम्हें पिलाते रहे वो आज तक कि  खाली जाम हो गए

जो वादे किये थे लोगों से निभा दे अब तो
इन्तेजार में खड़े ये सुबह से न जाने कब के शाम हो गए


दीपक


सबकी किस्मत तो तू अपने हाथों से लिखता है ना ? एक सितारे से कह देना मेरा भी सलाम मेरे ख़ुदा।।

क्यूँ इतने इत्तेफाक मेरी झोली में डाल दिए खुदा
सबको मोहब्बत दी मुझे आँसुओं की कैद में डाल दिया खुदा।।

इस गाँव में तो और भी घर थे मेरे आका
क्यूँ ऐसी हवा चली कि बस मेरी छत को निकाल  दिया ख़ुदा।।

तैरना तो औरों को भी नहीं आता
बस मेरे घर में आ जाती है यह बाढ़ मेरे खुदा।।

तेरा सूरज तो सबके लिए चमकता है
फिर सुबह होते ही क्यूँ हो जाती है मेरी शाम मेरे खुदा।।

सबकी किस्मत तो तू अपने हाथों  से लिखता है ना ?
एक सितारे से कह देना मेरा भी सलाम मेरे ख़ुदा।।



तेरी पहली मुस्कराहट की दिल में कसक आज भी है वो लम्हा याद है मुझे , वो झलक आज भी है

तेरी पहली मुस्कराहट की दिल में कसक आज भी है
वो लम्हा याद है मुझे , वो झलक आज भी है

तेरे चलने से पड़े थे मेरे दिल के रास्तों पे निशां उम्मीदों के
बीच रस्ते में तेरी पायल के टूट जाने की झनक आज भी है

टूट जाने से मेरे सपने ,गिनती में बढ़ गए
वो आइना याद है मुझे , वो खनक आज भी है

तेरे लिए मेरे सारे गीत गाते हैं , कभी तुझ तक भी ये आवाज पहुंचे
कि  मेरी तनहाइयों में तेरी यादों की भनक आज भी है

दीपक

किताबों में पन्नों से ज्यादा गुलाब की पंखुडियां हुआ करती हैं और जेब में रुपयों से ज्यादा चवन्नियां हुआ करती हैं


फूल अगर गुलाब का हो तो भँवरे हजार होते हैं
एक ऐसा भी दौर होता है जब बंद आँखों से भी दीदार होते हैं

जब नब्ज को टटोलना नहीं पड़ता और धड़कने भी पास पास होती हैं
एक ऐसा भी दौर होता है , जब हम शायर नहीं होते पर हर शायरी खास होती है

जब नींद को यादों से बुझाया , और यादों को यादों से लड़ाया जाता है
एक ऐसा भी दौर होता है जब आंसू से आँखों को बहाया जाता है

किताबों में पन्नों से ज्यादा गुलाब की पंखुडियां हुआ करती हैं
और जेब में रुपयों से ज्यादा चवन्नियां हुआ करती हैं
जब घंटों खुद से बतलाने के बाद भी कुछ बातें बाकी रह जाती है
एक ऐसा दौर भी होता है जब रस्ता ख़त्म भले हो जाये, मंजिल बाकी रह जाती है

दीपक







यहाँ मैं क़त्ल होता हूँ हर रोज मेरी अर्थी निकलती है

यहाँ मैं क़त्ल होता हूँ हर रोज मेरी अर्थी निकलती है
कभी गरीबी , कभी शराफ़त के जुर्म में मारा जाता हूँ
मेरे फसाने यहीं ख़त्म नहीं होते
कभी भूख ,कभी बेकारी के जुर्म में मारा जाता हूँ

लोग पूछते हैं कि सड़क क्या तेरे बाप की है ?
फुटपाथ पर सोने के जुर्म में  मारा जाता हूँ।।

मैं परिंदा न बन सका फिर भी ख्वाबों में उड़ता हूँ,
सपनों की चाशनी में डुबो डुबो कर मारा  जाता हूँ।।

हद तो ये है की पूरी तरह मरने भी नहीं देते,
जिंदगी की उम्मीद के नीचे हर बार मार जाता हूँ।।

दीपक






हाफ पेंट- लघु कथा

जेठ  की भरी गर्मी में ,पसीने से पुते चेहरे के बीचों बीच रामू की फैली हुई मुस्कान और चमकती आँखों ने गवाही दी की उसके पापा खाकी रंग का हाफ पेंट खरीदकर लाये हैं। मलेरिया की कंपकपी और जलती गर्मी के झुलसा देने वाले लू के थपेड़े भी शायद उतने ताकतवर नहीं होते जितनी एक बालसुलभ हठ और उत्सुकता होती है।

रामू उठा और लपककर पापा के हाथों से छीनकर हाफ पेंट पहन ली।इस बात बात से कोई फरक नहीं पड़ा कि  दादी पीछे से चिल्लाती रह गयी " जूड़ी पाँच दिन में उतरेगी लल्ला , अभी तुम पूरी तरह ठीक नहीं न हो ! पर दादी की पोपली आवाज कहाँ बचपन की रवानी को रोक पाती। बचपन है ही ऐसा . बचपन में सब आप के पीछे भागते हैं क्यूंकि आप भविष्य होते हो . जवानी में सब आपके साथ चलते हैं क्यूंकि तब आप वर्तमान होते हो . बुढ़ापे में कोई नहीं होता , न साथ में न पीछे , क्यूंकि तब आप गुजर जाने की स्थिति वाले भूतकाल होते हो।

सबने हाफ पेंट की तारीफ की। तारिक ,किसना ,हेमू सब ने !

जूड़ी उतरी तो रामू स्कूल भी जाने लगा . अपना हाफ पेंट पहनके ,जिसमे तीन जेबें थीं . दो बगल में एक पीछे . पीछे वाली जेब में चूरन वाली गोलियों  के लिए दी गयी चवन्नियां खनखनाती और बगल वाली जेबों में कंचे की लाल , हरी भूरी गोलियां ठुमका करतीं . स्कूल सरकारी था , लंबे से हाल में सभी कक्षाओं को साथ बिठा लिया जाता . लम्बी लम्बी टाट की बनी पट्टियां बैठने के लिए बिछाई जातीं  जिन पर बैठ सिर हिला-हिला कर पहाड़े याद करते बच्चे कभी एक दूसरे को कोहनी ,कभी सिर  मारते , कभी हँसते कभी खीझते।

फटी हुई टाटपट्टियों के बड़े-बड़े छेदों के बीच बैठने के लिए जगह मिलना मुश्किल होता . रामू जल्दी आता . उसे बैठने के लिए जगह बनानी होती ,उसका हाफ पेंट जो नया था। अपने खाकी पेंट के लिए रामू के दिल में
अपार प्रेम था। इससे पहले वाला पेंट तो नीला था , बड़े भाई की उतरन ! पर ये वाला नया था ,उसका अपना।इसके लिए रामू कुछ भी करता !उसकी सर्दी की नाक भी अब सामने वाले बच्चे की पेंट की ही शोभा बढाती .

तीन जेबें थीं मगर उसमे पूरी दुनिया भर लेने का ख्वाब। दस साल की उमर ,हड्डियों का ढांचा , कहीं मांस का नामोनिशान नहीं। इस बार जब सरकारी डॉक्टर जाँच के लिए आई तो पूछा अरे वाह तुम्हारा हाफ पेंट तो बड़ा अच्छा है , किसने दिलाया ? " पापा ने ! शरमाते हुए रामू ने कहा . " अपनी अम्मा से बोलना तुमको दूध और हरी सब्जी खिलाये , बहुत कमजोर हो तुम !

घर जाकर रामू ने अम्मा से कहा मेरा  हाफ पेंट बहुत अच्छा लगा डॉक्टर आंटी  को और उसने बोला अम्मा से बोलना कि एक और लेकर दो "

स्कूल में हर शनिवार दलिया बाँटा जाता . रामू खाता और जेब में भरकर भी लाता . एक बार जब रामू को दस्त लगे तो बेचारा स्कूल से भागा पर बहुत कोशिश करने के बाद भी अपने हाफ पेंट को नहीं बचा पाया .
ऊपर से बहती पीली धार ने चप्पलों को तर कर दिया . घर पर मार भी पड़ी पर उसकी पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि  क्यूँ ? रात को अम्मा ने प्यार किया , दवाई भी दी . रामू ने पूछा " मेरा पेंट धो दिया ?"

वो हाफ पेंट रामू का जीवन केंद्र था . फाउंटेन पैन की स्याही के छींटे ,घिस चुकी जेबें , और ढीला पड़ चुका इलास्टिक का नाडा इन सब के बावजूद अपने हाफ पेंट पे फक्र था उसे . उसने हेमू के घर जाना बंद कर दिया   क्यूंकि वहां उसका पालतू पिल्ला रामू के पेंट के पीछे पड़  जाता।

रामू के मुहल्ले में शाम को शाखा चलती . सब बच्चे इकठ्ठा होते ,खेलते , करते  और  राष्ट धर्म की कसमे खाते . शाखा वाले भैया बताते की हम खाकी पेंट पहनने वालों के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है। हम हाफ पेंट पहनते हैं क्यूंकि हम जानते हैं की हम एक ग़रीब देश में रहते हैं जहाँ लोगों को रोटी - कपडा -मकान का अभाव है ,ऐसे में हमें सादा कपड़े पहनना चाहिए .

"खाकी रंग देश भक्त का होता है ,इसलिए मैं पहनता हूँ " जब रामू ऐसा बोलता तो पापा हंस पड़ते .

रामू बड़ा होता गया और हाफ पेंट छोटा . उसे अलमारी में सम्हाल कर रख दिया .रामू ने दसंवी पास कर ली और खेती बाड़ी में बाप का हाथ बांटने लगा . फिर एक ऱोज पुलिस की भर्ती निकली,फार्म भरा गया  और रामू , हवालदार रामवीर बन गया .  ट्रेनिंग शुरू हुई तो खाकी वर्दी भी मिली .

पहली बार घूस का पैसा लेकर घर में आया कहा "अम्मा इसे अलमारी में रख दो "

अम्मा पैसा रखकर वापस आई और बोली "बेटा अलमारी में तेरा बचपन वाला हाफ पेंट रखा है , अब तेरे पास पूरी खाकी वर्दी है ..इसे अब भी साथ रखेगा क्या ?

"नहीं अम्मा फ़ेंक दे उसे !" हवालदार रामवीर बोला  .......................


दीपक










Thursday, May 9, 2013

मेरा खुदा अगरबत्तियों के धुंए के पीछे छुपा कोई डराने वाली चीज नहीं और न ही उसकी आड़ में हर काले काम को सफ़ेद बनाने वाले मुल्लों , पंडितों में मेरी दिलचस्पी

मेरा खुदा अगरबत्तियों के धुंए के पीछे छुपा कोई डराने वाली चीज नहीं और न ही उसकी आड़ में हर काले काम को सफ़ेद बनाने वाले मुल्लों , पंडितों में मेरी दिलचस्पी . मेरा खुदा साफ पानी का बहता वो झरना है जिसका पानी हर प्यासे को मयस्सर है . जो कातिलों का इसलिए है की उन्हें सच्चे रस्ते पे चला सके और काफिरों का इसलिए है की एक वही उसे पूरे दिल से याद करते हैं भले ही इस बात के लिए ही सही कि खुदा नहीं है।

मेरा खुदा वो है जो बाइबिल के काले अक्षरों की भूल भुलैया से निकल कर , मंदिरों की चार दिवारी को तोड़कर बाहर निकलने ही हिम्मत रखता है . जो दरगाहों की नक्काशीदार जालियों से मूक बना सिर्फ ताकाझांकी नहीं करता बल्कि जिसकी पहुँच हर दरो दरबार , दिल और उसके भी परे होती है .

जो मंत्रो के चंद  अक्षरों में  कैद नहीं बल्कि संगीत की स्वर लहरियों संग फूटता है , बच्चों की भोली मुस्कान सा फैलता , कभी प्रेम की धुन पर बेबस नाचता ,कभी कल-कल ,कभी सन्नाटे में  व्याप्त  मधुर गुंजन सा गुदगुदाता हुआ ,कभी अचानक अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाता कभी छुप जाता सा .

हाँ मेरा खुदा अक्षत के चार दानों और पुष्प की चार पंखुड़ियों का मोहताज नहीं . मेरा खुदा किसी प्रसाद किसी वायदे का भूका नहीं . पर हाय ....लोगों ने उसे भी सेवक बना रखा है ....चार चावल , कुछ उड़द दाल के दाने , थोड़ी सी हल्दी ...अरे इतने में तो खिचड़ी नहीं बनती , ईश्वर कैसे बन जायेगा .

हाथ में एक कलावा बंधने , मुंह पर हल्दी पोत लेने , गले को तावीज से घोंट लेने से कहीं खुद मिला है किसी को . वो कबीर को मिला , वो मीरा को मिला वो जब - जब मिला किसी रामकृष्ण को मिला जिसे न अपने कपड़ों की सुधि थी न स्थिति का ज्ञान .

मंदिर किसी गृहस्थ का घर नहीं जो घंटी बजने से खुल जायेगा . एक बार मन की तरफ मुंह फेर कर घंटी बजाओ शायद कुछ हो जाय . एक बार बिना किसी स्वार्थ के जाओ उसके पास ..शायद मिल जाये ...पर
बिना स्वार्थ के जाऊंगा तो मिल जायेगा यह सोच के मत जाना ...क्यूंकि ऐसा सोचना भी स्वार्थ है ..एक बार अपने बच्चे से सीखना बिना स्वार्थ के कैसे कहीं जाते हैं फिर जाना ..मिल जायेगा .

ये हरा रंग बहुत पहन लिया , भगवा भी बहुत रंग लिया ! अब किस रंग के तलाश में हो ? जिसे ढूंढ़ते  हो उसका कोई रंग  ही नहीं है .जो निष्काम है वो कामना करने से कैसे मिल सकता है ? जो सबका है वो किसी एक को कैसे मिल सकता है ?जिसका कोई मूल्य नहीं वो प्रीपेड दान करने , वायदे करने से  कैसे मिल सकता है ? तुम्हारी इच्छाएं पूरी करने वाला वो नहीं तुम्हारा छुद्र स्वार्थ है जिसे तुम ईश्वर मान बैठे हो . अपनी संकरी परिभाषाओं के परे झाँको और जो प्रकाश दिखाई दे वही इश्वर है ऐसा समझो . फिर उसकी खोज करो .








Wednesday, May 8, 2013

सॉरी पापा !! - लघु कथा

रोज जीना और फिर खुद में दफ़न हो जाना ,कितना अजीब सा अहसास है किसी ऐसी जिन्दगी के बारे में सोचना जिसमे कुछ नया नहीं है .जिसमे लड़ने वाले दो लोग हैं . खुद की लड़ाई खुद ही  से है .खुदा जहाँ खुद से बैगैरत है और आसमान में बैठे तमाशबीन से ज्यादा कुछ नहीं .सठिया गए बूढ़े  की तरह वो खींसे -निपोरता कभी चादर मांगता, और कभी जब उसका हुक्का पीने का दिल करता चार - छह धूप की बोटियाँ उसके मुंह में  ठूस दी जाती , कम से कम बेचारा कुछ देर मुँह के भीतर जलते सुगन्धित प्रसाधनों में उलझा रहेगा .

फिर नमाज के बाद समझ लिया जाता कि दोजख का रास्ता जैसे हमेशा के लिए बंद हो गया .लोग बुदबुदाते  रहते और सब सर झुकाते मगर कोई उनसे नहीं पूछता कि वो लोग कुछ ढंग का कम क्यूँ नहीं करते .

मंदिर में या मस्जिद में, कहीं भी गया ऐसा लगा कि इन घंटियों के बीच , इन अजानों के बीच गहरा कोई सन्नाटा है जो मौकापरस्त, मक्कार संप की तरह घात  लगाये बैठा है . इसे जब-जब मौका मिला इसने डसा . कभी ४७ ,कभी ८४, कभी बाबरी ,कभी गोधरा . फिर मौलवी की बढ़ी दाढी हो या पंडित की चुटिया ,किसी को भी इसने नहीं बक्शा .

मेरे बच्चे ने पूछा सड़क के उस पर वाली गलियों में जाने की पाबन्दी क्यूँ है ? मैंने कहा वहां खुदा रहता है ! इसलिए पाबन्दी है .

वो एक दिन बिन बताये उन्हीं गलियों में आगे बढ़ गया .शाम तक न लौटा तो मुझे चिंता हुई . मैं भी जहाँ कभी न जाने का फक्र दिल में पाले बैठा था , वहां के लिए चल पड़ा . खूब ढूंढा .ढूंढता ही रहा . जब तक थक न गया शाम न हुई -बस ढूंढता रहा .शाम को जब कसाइयों की दुकानों पर बोटियाँ बिकने लगीं तो दिल दहल गया मैं दुकानों पर भी घुमा की कहीं .....पर इंसानी गोश्त की पहचान मुझे नहीं थी ...डर था क्यूंकि सब गलत हो रहा था और जनेऊ  काटे जा रहे थे . हर तरफ अफरातफरी का माहौल सा था .ऐसे में मेरा बेटा खुदा को खोजता हुआ यहाँ आया होगा . दस साल की उम्र में हर चीज को जानने का तूफान दिल में हिंडोले ले रहा होता है .फिर उसका क्या दोष !

मैं थके क़दमों से चरों तरफ ढूंढता रहा . फिर देखा कि खुदाबक्श के घर के पास अंजीर के पेड़ के नीचे वो खेल रहा है .मैंने उसे लात घूंसों से मारा ,लताड़ा और घसीटा . बिना इस बात पर गौर किये की वो जिन्दा है और सही सलामत है .

उसने कहा खुदा ढूंढने नहीं आया था !!  वो तो हमारे भगवान्  के पास ही कहीं रहता है . जब भगवान् मिल जायेगा तो खुदा का बिस्तर भी ढूंढ़ लेंगे .

एक बच्चा यहाँ से हमारे यहाँ आ गया था भगवान ढूंढ़ते  हुए . उसको मैंने बताया की हमारा भगवान तुम्हारे खुदा  के पास ही रहता है उसे ढूंढ़ते हुए तुम रास्ता भटक गए हो. यहाँ कोई भगवान नहीं सिर्फ भगवा है . तुम अपने खुदा  के पास ही रहो . जब वो मिल जाये तो भगवान भी मिल जायेगा .तब मुझे भी मिलाना .

इस छोटे बच्चे को खुदा  के पास वापस करने आया था और यहीं खेलता रह गया . सॉरी पापा !!






सच बताओ डार्लिंग क्यूँ है ऐसा इंडिया ?

भरी गर्मी में बहती नाक को हाथों से रगड़ते और पेंट पर पोंछते बच्चे , सड़क के किनारे लाचार लाश जैसी खड़ी उनकी मां और उसी सड़क पे AC गाड़ियों में दौड़ते बंद दिमाग हृदय विहीन समाजसेवक नेतागण ......डार्लिंग यही है इंडिया .

जिस देश में निर्मल बाबा जैसा टुच्चा अभिनेता पढ़ी - लिखी जनता का उल्लू बना सकता है , जहाँ दो कौड़ी के इमोशन्स फिल्म को  हिट कराने  और चुनाव में  जीत दिलाने के लिए काफी होते हैं .......डार्लिंग यही वो इंडिया है

जहाँ का युवा आज तक भारत भूमि के न जाने कब के गुजर चुके स्वर्ण युग का जिक्र हर तर्क में तो  करता है पर कोई भी कर्मभूमि में आकर असली लड़ाई नहीं लड़ना चाहता ....दिस इस इंडिया

जहाँ विवेकानंद और गाँधी किताबों/वाचनालयों में कैद हों और खुलेआम मायावती के पुतले चौराहों पर
लगाये जाते हों ...

जहाँ लाखों लोग आज भी भूख ,बीमारी अशिक्षा ,दरिद्रता और दिशाहीनता के कारण मौत का शिकार होते हों पर सरकारी खातों में आल इस वेल हो ....

जहाँ गरीबी रेखा कार्ड सिर्फ गरीब के पास न हो ......

जहाँ लाश पर हास्य हो ...

जहाँ मीडिया से सरकार को दुर्घटनाओं का पता चले ....

जहाँ सरकार को जगाने के लिए रोज युवाओं को कामकाज छोड़कर आंदोलनों में  जाना पड़े ...

जहाँ हर चीज को सही सिद्ध करने के लिए तर्क और साक्ष मौजूद हों ....

सच बताओ डार्लिंग क्यूँ है ऐसा इंडिया ?